Wednesday, April 9, 2014

‘पानी का निजीकरण’ – बहसों पर एक बहस

आज के समय में पानी के निजीकरण का मुद्दा काफी जोरों पर है. ऐसे में कई तरह के विचार अक्सर ही सुनने को मिलता है. यह लेख आज के समय में चल रही बहसों के कई पहलुओं को उजागर करने की एक कोशिश है. मार्च के महीने में ‘विश्व जल दिवस’ के आलोक में आयोजित कई गोष्ठियों में से कुछेक में जाने का मौका मिला और उनमें हुई बातचीत को ‘सबलोग’ के साथ बाँटने की इच्छा और आवश्यकता दोनों ही  महसूस हुई. इस सन्दर्भ में, ‘इच्छा’ और आवश्यकता’ – इन दो शब्दों को मैं पूरक के रूप में ले रही हूँ. हालाँकि, पानी के विषय पर सबलोग के पिछले अंकों में अपने लेखों में मैंने इन दो अवधारणाओं के मद्देनजर कुछ खास सावधानी बरतने की जरूरत पर बल दिया है. क्या ये दोनों हमेशा ही पूरक हैं या फिर कई बार ये विपरीतार्थक भी हो सकते हैं? मसलन, पानी के बाजारीकरण के क्रम में जिस तरह से वर्ल्ड बैंक एवं अन्य सहभागी संस्थाओं ने पानी के बारे में  हमारी समझ को भी एक खास ढंग से प्रभावित किया है. आजकल आपको अक्सर ही इस तरह की बहसें सुनने को मिल जाएँगी – पानी को हम क्या मानें? – क्या पानी एक आर्थिक वस्तु है या सामाजिक वस्तु? यह पहले आर्थिक है या सामाजिक? कई बार ये सवाल बड़े बचकाने मालूम पड सकते हैं या फिर हम सबके पास इन सवालों के अलग अलग तरह के उत्तर हो सकते है. पर इन पर गौर करने से ये प्रश्न वर्तमान में चल रही पानी पर राजनीति की दिशा तय करते नजर आते हैं. यहाँ इस लेख के माध्यम से मैं आपका ध्यान एक खास दिशा में आकर्षित करना चाहूँगी.
आज के समय में जब पानी के निजीकरण का मुद्दा जोरों पर है, ऐसे में अवधारणाओं के स्तर पर भी कई तरह की बहसें चल रही हैं. जो सवाल मैंने पानी के आर्थिक व सामाजिक पहलू को लेकर पहले उद्धृत किये हैं, उनपर ही बहस को आगे बढ़ाते हुए मैं दूसरा सवाल आपके सामने रखती हूँ – पानी एक जरूरत/ आवश्यकता (नीड) है या फिर इच्छा (वांट)? क्या हम इन दो अवधारणाओं को एक दूसरे के समानार्थक के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं? आज पानी के निजीकरण के विरोध में खड़े कई आंदोलनों ने ‘पानी के अधिकार’ (राइट टू वाटर) का नारा दिया है. ऐसे में अधिकार की भाषा शायद जरूरत के आधार पर बन रही है न कि इच्छा के आधार पर. हालाँकि विश्व बैंक जैसी संस्थाएं ‘जरूरत’ और ‘इच्छा’ (‘नीड’ एवं ‘वांट’) जैसी दो नितांत भिन्न अवधारणाओं के बीच के अंतर को काफी तेजी से पाटने की कोशिश कर रही हैं. इसके पीछे दलील यह दी जाती है कि हमें अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए बाजार की जरूरत है – ऐसे में एक जरूरत के रूप में पानी को भी बाजार के भरोसे छोड़ देना बेहतर है. नव-उदारवादी व्यवस्था में बाजार को सबसे समझदार एवं उपयोगी संस्था मानते राज्य की तुलना में बाजार को एक विकल्प के रूप में तवज्जो दिया जाना भारत जैसे विकासशील देशों के सन्दर्भ में कई स्तर (नीति, संस्था, आदि) पर जटिलताओं को जन्म देता है.  
इंडियन सोशल इंस्टिट्यूट में सिटीजन फॉर वाटर डेमोक्रेसी (सी एफ डब्लू डी) द्वारा कुछ अन्य संस्थाओं  मसलन फोकस ऑन दी ग्लोबल साउथ, वाटर वर्कर्स अलायन्स, देल्ही जर्नलिस्ट असोसिअसन, पीस, आदि के साथ मिलकर 19 मार्च, 2013 को ‘पानी के निजीकरण’ के मुद्दे पर भारत एवं अन्य देशों के अनुभवों पर चर्चा की गयी. पूरे दिन की सभा में रहने का तो नहीं पर दो-तीन महत्वपूर्ण व्यक्तियों जैसे मेधा पाटकर एवं अरविन्द केजरीवाल को सुनने का मौका मिला. इन दोनों के वक्तव्य से पहले एस. ए. नक़वी जी जो कि सी एफ डब्लू डी के प्रमुख हैं को भी सुनने का मौका मिला. इस संस्था एवं नक़वी जी ने पानी के मुद्दे पर दिल्ली में खास कर सोनिया विहार प्लांट के निजीकरण को रोकने में काफी महत्वपूर्ण काम किया है. इन्होने दिल्ली में पानी की समस्या के विभिन्न पहलुओं से लोगों को अवगत करवाया. आने वाले समय में किस किस तरह की समस्याएँ खड़ी हो सकती हैं, इस पर भी काफी चर्चा की.
केजरीवाल जी ने अपने वक्तव्य में नक़वी जी की बातों पर अपनी सहमति जताते हुए कुछ और स्पष्ट उदहारण दिए – दिल्ली में पानी की कीमत पिछले नौ सालों में अठारह गुना बढ़ी है; आम आदमी पार्टी द्वारा आयोजित अधिकांश जनसभाओं में पानी का मुद्दा एक प्रमुख समस्या के रूप में उभरा है; प्रधानमंत्री गाँव गाँव तक पानी पहुँचाने की बात कर रहे हैं जबकि देश की राजधानी स्वयं पानी की समस्या से जूझ रही है; दिल्ली में टैंकर माफिया की समस्या; अधिकांश पानी की लीकेज में बर्बादी की समस्या, आदि. केजरीवाल जी की बातों में एक तरह का आंतरिक द्वंद्व प्रतीत होता है. कुछ वैसा ही जैसा कि मैंने पहले लिखा है – पानी पहले एक सामाजिक वस्तु है या आर्थिक? उसी तरह पानी क्या पहले देश की राजधानी को ठीक से मिले फिर गांवों को. खैर, मेरे लिए इस वक़्त बहस का मुद्दा ये नहीं है कि पानी को लेकर प्रधानमंत्री जी सही हैं या केजरीवाल जी. यह फैसला अपने पाठकों पर छोड़ते हुए इस लेख के अगले भाग में मेधा पाटकर जी के वक्तव्य पर चर्चा करते हैं.    
मेधा पाटकर ने विकास के नाम पर हो रही विकृति को रोकना आज के समय की जरूरत होना बताया. गोष्ठी में महिलाओं की कम उपस्थिति को सोचनीय बताते हुए पानी के मुद्दे को उनसे बहुत जुड़े होने पर बल दिया. पानी को जीवन का आधार व भारत की संस्कृति में इसके अहम् स्थान का उल्लेख करते हुए वर्तमान में मराठवाडा की दयनीय स्थिति व आसाराम बापू द्वारा होली खेलने में पानी की बर्बादी को लोगों को भुलावे में डालने जैसा बताया. उन्होंने गांवों में पानी के ब्राह्मणवादी बंटवारे की तरफ लोगों का ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि पानी को वस्तु मानकर कुछ मुट्ठी भर लोगों के हाथ में केन्द्रित नहीं होना चाहिए. जल नियोजन पहले बूँद से ही शुरू हो तभी विकेंद्रीकरण संभव है. जहाँ बड़े बांध की राजनीति केन्द्रीकरण व पानी को शहरों तथा बड़ी कंपनियों की तरफ मोड़ने की तो कोक और पेप्सी जैसी कम्पनियाँ भूजल पर कब्ज़ा कर देश को परावलम्बी करने की कोशिश कर रहे हैं. सरकारी नीतियों द्वारा उद्योगों के लिए पानी के आरक्षण को बाजारवादी व अलोकतांत्रिक बताते हुए उन्होंने संघर्ष एवं निर्माण की प्रक्रिया के एकसाथ चलने पर बल दिया. जन आंदोलनों की महत्वपूर्ण भूमिका को बताते हुए इन्हें अलोकतांत्रिक/अराजनैतिक न मानकर इनके द्वारा चुनावी राजनीति में हस्तक्षेप को आज के समय में बहुत आवश्यक बताया. अपने वक्तव्य के अंत में मेधा जी ने कुछ नारे भी लगवाए – ‘गाँव का पानी गाँव में समाये, सूखा हमें यही सिखाये’, ‘पेप्सी नहीं, पानी चाहिए’, ‘नदियाँ बचाओ, देश बचाओ’.
इस सभा में जहाँ नक़वी जी एवं केजरीवाल जी के वक्तव्य सांख्यिकी से भरे पड़े थे वहीँ मेधा जी का वक्तव्य भाव विह्वल करने वाला जान पड़ा. हम शायद एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ हर व्यक्ति समस्याओं के समाधान पर कम और दूसरों पर दोषारोपण करने में अधिक वक़्त जाया करता मालूम पड़ता है. अक्सर ही ‘पानी की राजनीति’ या फिर कहें ‘पानी पर राजनीति’ कहीं न कहीं से इस तरह के आरोप एवं प्रत्यारोप में संलग्न मालूम पड़ती है. इस आयोजन के दो दिन बाद ही अपने शोध कार्य (रिसर्च वर्क) के सिलसिले में गाँधी शांति प्रतिष्ठान जाना हुआ और वहां के प्रबंधक अनुपम मिश्र जी से मैंने इंडियन सोशल इंस्टिट्यूट में हुए आयोजन का जिक्र किया. इस पर उनकी प्रतिक्रिया एवं टिपण्णी मुझे काफी ज्ञानवर्धक जान पड़ी. अन्य विचारों की तरह पानी के निजीकरण के मुद्दे पर भी उनका नजरिया नितांत भिन्न जान पड़ा. उन्होंने कहा आज से नहीं बल्कि एक लम्बे समय से तालाब, कुआँ, आदि किसी की निजी संपत्ति ही हुआ करते थे और उन्हें समाज कल्याण हेतु समर्पित कर दिया जाता था. आज के समय में ‘समाज के प्रति सोच’ में बहुत कमी आई है.
अनुपम जी ने अपने अन्य लेखों जैसे ‘तैरने वाला समाज डूब रहा है’, ‘अकेले नहीं आता अकाल’, आदि में भी इस ओर इशारा किया है. उनकी दो पुस्तकें ‘आज भी खरे हैं तालाब’ एवं ‘राजस्थान की रजत बूँदें’ आज के समय में कई लोगों को ‘पानी का काम’ करने के लिए देश भर में प्रेरणा के स्रोत हैं. उनसे हुई बातचीत में जो दूसरी महत्वपूर्ण बात बतायी वह वर्तमान और आने वाले समय के लिए और भी प्रासंगिक जान पड़ी जिसका जिक्र मैं यहाँ करना चाहूंगी. उन्होंने कहा कि इस तरह के अधिकांश गोष्ठियों का आयोजन जो पानी हमारे पास है, उस पानी के बंटवारे की की राजनीति पर बहस के लिए किया जा रहा हैं. इस विषय पर सोचने पर निश्चय ही कुछ मुद्दे हमारे सामने आते हैं -- यह बंटवारा कौन करे और कैसे करे? इस बंटवारे का आधार क्या हो? ऐसे में राज्य, बाजार, व्यक्ति, समूह, आदि की बातें आती है. अनुपम जी का प्रश्न था कि हम पानी को रोकने के निजीकरण की बात क्यों नहीं करते हैं? कितने लोग पानी को रोकने के सवाल पर सोच रहे हैं?
बाद में मैंने इस विषय पर गौर से सोचने पर पाया कि विगत वर्षों में पानी के मुद्दे पर आयोजित कई गोष्ठियों में हिस्सा लेने और कई लेखों को पढने के क्रम में, शायद ऐसा कुछ बहुत कम ही सुनने और पढने को मिला. आज के समय जब स्वयंसेवी संस्थाओं (एन.जी.ओज) की भूमिका पहले की तुलना में बहुत बढ़ गयी है और इनमे विचारधाराओं एवं मुद्दों की विविधता को देख पाना संभव भी है और कई बार काफी मुश्किल भी. पानी के मुद्दे पर भी कई तरह की संस्थाएं काम कर रही हैं. इनमे से कुछ शोध कार्यों में संलग्न हैं तो कुछ लोगों को अपने अधिकारों के प्रति सचेत करने में. इस नव-उदारवादी दौर में, ‘निधिकरण की राजनीति’ (पॉलिटिक्स ऑफ़ फंडिंग) और ‘आंकड़ों की राजनीति’ (पॉलिटिक्स ऑफ़ स्टेटिस्टिक्स) के प्रति भी विशेष रूप से सचेत रहने की आवश्यकता है. आये दिन अख़बारों और टी.वी. चैनलों पर विभिन्न मुद्दों पर प्रतिशतता की राजनीति देखी जा सकती है.

संक्षेप में, जैसा कि इस लेख का उपशीर्षक ही मैंने ‘बहसों पर एक बहस’ दिया है, हाल ही में भारत सरकार के जल मंत्रालय द्वारा तैयार किये ‘राष्ट्रीय जलनीति रेखाचित्र 2012’ (ड्राफ्ट नेशनल वाटर पालिसी) का जिक्र करना चाहूंगी. यह मसौदा जल के क्षेत्र में तीसरा राष्ट्रीय प्रपत्र है. इससे पहले 1987 एवं 2002 में पहली व दूसरी राष्ट्रीय जलनीति बनायी गयी थी. यह तीनों ही मसौदे क्रमशः निजीकरण की ओर अग्रसर जान पड़ते हैं. सबसे हाल के समय यानि 2012 में बने रेखाचित्र में सबसे स्पष्ट रूप से ‘वाटर प्राइसिंग’ व ‘वाटर ऑडिटिंग’ जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गयी है.  दूसरी तरफ विश्व भर में ‘पानी के अधिकार’ के मांग को लेकर राजनीति भी काफी तेज होती जा रही है. इसमें निजीकरण के विरोध में चल रहे जन आंदोलनों की महत्वपूर्ण भूमिका है. इस बारे में कोई चर्चा इस रेखाचित्र में नहीं है. ऐसे में, यह अधिकार कितना अहम है और अगर राज्य द्वारा इसे दे भी दिया जाये तो इसका आधार क्या हो, एक महत्वपूर्ण मुद्दा है. हालाँकि, एक बात जाहिराना तौर पर साफ़ मालूम पड़ती है कि आने वाले समय में केवल ‘पानी के राजनितिक पहलू’ की जटिलता बढती ही जा रही है. ऐसे में राजनीति के साथ साथ पानी के ‘सामाजिक व मानवीय पक्ष’ को समझना आज के समय की जरूरत बन गयी है.    

पानी के स्त्रोत और रीति रिवाज

गर्मियों के आते ही दिल्ली में जब कमोबेश हर व्यक्ति पानी से सम्बंधित अनेकानेक समस्याओं से रूबरू होता है, ऐसे में मुझे बरबस ही अपने बचपन के दिनों में गाँव में बिताये गर्मी की छुट्टियों की याद आती है. इन छुट्टियों की यादें अपने साथ कई तरह के अनुभवों को भी समेटे रखने का भी काम करती है. यही छुट्टियों का समय होता था शादियों एवं मुंडन, इत्यादि का भी. ऐसे में कई बार एक पंथ दो काज के क्रम में घर परिवार के कई सदस्यों एवं दूर के नाते रिश्तेदारों से मिलना जुलने का भी मौका मिलता था. मिथिला क्षेत्र में लगभग सभी संस्कारों के लिए पानी के स्त्रोत के पास कुछ रीति रिवाज संपन्न किये जाते हैं, जैसे शादियों में कुएँ से पानी भरा जाना, मुंडन या यज्ञोपवीत के पहले और बाद भी कुएँ के पास कुछ कर्म कांडों का किया जाना. यहाँ तक कि मृत्यु के बाद भी शव का दाह संस्कार भी नदी या पोखर के पास किया जाना शुभ माना जाता है. कुल मिलाकर आप किसी भी संस्कार की बात करें तो इसका सीधा संबध पानी के स्त्रोत से होता था. अब भी कमोबेश है लेकिन एक नए स्वरुप में. आज भी कभी-कभार गाँव जाना होता है पर वहां कुएँ या पोखर नहीं के बराबर रह गए हैं या फिर हैं भी तो बहुत ही जीर्ण-शीर्ण अवस्था में. ऐसे में उन सब रीति-रिवाजों में भी स्वतः परिवर्तन देखने को मिलता है. एक तो माध्यम वर्ग के अधिकांश लोग आसपास के शहरों या महानगरों में आ बसे हैं तो शादी-विवाह और मुंडन जैसे संस्कार भी शहरों में ही हो रहे हैं और अगर कभी गाँव में हो तो कुओं और पोखर की की जगह अब चापाकल ने ले ली है. शहरों में ये रीतियाँ नलों के पास निभाई जाती हैं. जहाँ कुआँ और पोखर एक सामूहिक अहसास का भाव देता था वहीँ नल और चापाकल के पास इन रीतियों के संपन्न होने से उनमे भी एक व्यक्तिगत भाव का आना जान पड़ता है. इस तेज बदलाव के दौर में लम्बे समय से चली आ रहे रीति-रिवाज भी इनके प्रभाव से अछूते नहीं रह गए हैं. अगली पीढ़ी तो शायद अब इन नए तौर तरीकों से ही अपनी समझ बनाये पर हममें से कई लोगों के मन पर पानी के सामूहिक स्त्रोतों की छाप कम से कम यादों में तो सहज ही रची बसी रहेगी.