Wednesday, April 9, 2014

पानी के स्त्रोत और रीति रिवाज

गर्मियों के आते ही दिल्ली में जब कमोबेश हर व्यक्ति पानी से सम्बंधित अनेकानेक समस्याओं से रूबरू होता है, ऐसे में मुझे बरबस ही अपने बचपन के दिनों में गाँव में बिताये गर्मी की छुट्टियों की याद आती है. इन छुट्टियों की यादें अपने साथ कई तरह के अनुभवों को भी समेटे रखने का भी काम करती है. यही छुट्टियों का समय होता था शादियों एवं मुंडन, इत्यादि का भी. ऐसे में कई बार एक पंथ दो काज के क्रम में घर परिवार के कई सदस्यों एवं दूर के नाते रिश्तेदारों से मिलना जुलने का भी मौका मिलता था. मिथिला क्षेत्र में लगभग सभी संस्कारों के लिए पानी के स्त्रोत के पास कुछ रीति रिवाज संपन्न किये जाते हैं, जैसे शादियों में कुएँ से पानी भरा जाना, मुंडन या यज्ञोपवीत के पहले और बाद भी कुएँ के पास कुछ कर्म कांडों का किया जाना. यहाँ तक कि मृत्यु के बाद भी शव का दाह संस्कार भी नदी या पोखर के पास किया जाना शुभ माना जाता है. कुल मिलाकर आप किसी भी संस्कार की बात करें तो इसका सीधा संबध पानी के स्त्रोत से होता था. अब भी कमोबेश है लेकिन एक नए स्वरुप में. आज भी कभी-कभार गाँव जाना होता है पर वहां कुएँ या पोखर नहीं के बराबर रह गए हैं या फिर हैं भी तो बहुत ही जीर्ण-शीर्ण अवस्था में. ऐसे में उन सब रीति-रिवाजों में भी स्वतः परिवर्तन देखने को मिलता है. एक तो माध्यम वर्ग के अधिकांश लोग आसपास के शहरों या महानगरों में आ बसे हैं तो शादी-विवाह और मुंडन जैसे संस्कार भी शहरों में ही हो रहे हैं और अगर कभी गाँव में हो तो कुओं और पोखर की की जगह अब चापाकल ने ले ली है. शहरों में ये रीतियाँ नलों के पास निभाई जाती हैं. जहाँ कुआँ और पोखर एक सामूहिक अहसास का भाव देता था वहीँ नल और चापाकल के पास इन रीतियों के संपन्न होने से उनमे भी एक व्यक्तिगत भाव का आना जान पड़ता है. इस तेज बदलाव के दौर में लम्बे समय से चली आ रहे रीति-रिवाज भी इनके प्रभाव से अछूते नहीं रह गए हैं. अगली पीढ़ी तो शायद अब इन नए तौर तरीकों से ही अपनी समझ बनाये पर हममें से कई लोगों के मन पर पानी के सामूहिक स्त्रोतों की छाप कम से कम यादों में तो सहज ही रची बसी रहेगी.

No comments:

Post a Comment